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डिवाइड एंड रूल (Divide and Rule – Benefits of Displacement)

This is actually an Indian poem/joke on the harm that ‘divide and rule’ policy has caused. From anthropological point of view, it is actually about displacement. How easily people lose perspective as soon as they start ‘earning money’ in currency in exchange for anything they do! This happens not only in India but right here at home wherever you might be. It is happening. Think about it. ‘Displacement’ is the necessary tool in ‘Divide and Conquer’. History tells.

वास्तव में यह ‘विभाजन और शासन’ नीति के कारण होने वाली हानि पर एक कविता / चुटकला है जो भारतियों की तरफ से लिखा गया है।  मानव विज्ञान के दृष्टिकोण से यह विस्थापन के बारे में है।  लोग अपना परिप्रेक्ष्य फट से खो देते हैं, जैसे ही वो अपने किसी भी काम के बदले में मुद्रा रूपी ‘कमाई’ शुरू करते हैं।  यह सिर्फ भारत में ही नहीं  बल्कि हर जगह यही हाल है।  यही घटित हो रहा है।  सोचें।  कनाडा में भी यही कुछ हो रहा है।  ‘विभाजन और शासन’ विस्थापन से ही जोर पकड़ता है।  इतिहास बताता है। 

डिवाइड एंड रूल

एक बार तीन लोग बैठ कर बातें कर रहे थे…
और बड़ी जोर जोर से हंस रहे थे…

उन में से एक विदेशी था,
एक नेता था
और एक मीडिया चैनल का मालिक था…

सब से पहले विदेशी बोला –
यहाँ के लोग मूर्ख हैं..
हमारा कूड़ा खाते हैं…
हमारे कुत्तों के साबुन से नहाते हैं..
हमारे बनाए कीटनाशक को अमृत समझ के पीते हैं…
इनकी ही गौ-माता को मार कर…
हम नूडल्स पिज़्ज़ा बर्गर में मिलते हैं..
और यह मूर्ख इसे ब्रांडेड समझ के मजे से कहते हैं…
नीम की दातुन को छुड़वा के लगा दिया है कोलगते घिसने पे…
जो बनती है जानवरों की हड्डी पीसने पे….
दिवाली जैसे त्योहारों पे भी अब यह…
हमारी चॉकलेट कूकीज कहते हैं…
और अपनी गौ माता के दूध में…
हाई कोलेस्ट्रॉल बताते हैं…
हम यहाँ बैठ कर…
इंडो अपने इशारों पे नचवाते हैं…
राम सेतु आदि यहाँ बैठ के तुड़वाते हैं…
यह होते थे कभी दुनिया के मालिक….
आज नौकर इनको बना दिया है…
आसमान से पटक कर…
मिटटी में इनको मिला दिया है…!
पर इन मूर्खों को अभी भी अक्ल नहीं आई…
आज भी ब्रांडेड से नहाते हैं…
ब्रांडेड ही कहते हैं…
ब्रांडेड ही पहनते हैं…
ब्रांडेड पर ही चलते हैं….
हा हा हा हा हा हा

 

पूरे कमरे में गूँज रही ठहाकों की फुलवारी थी…

अब विदेशी के बाद नेता की बारी थी…

दारू का गिलास उठा के नेता बोलै…
अरे विदेशी भाई तुमने हमको कम तोला…
यह लोग तुम्हारे गुलाम न होते
हम अगर तुम्हारे साथ न होते…
हमने सोने की चिड़िया को रुलाया है…
यहाँ का राज हमने ही तुम्हे दिलाया है…
तुमने तो सिर्फ पैसा और सामान दिया है…
असली पागल तो इनको हमने किया है…
कभी जात के नाम पे…
कभी धर्म के नाम पे…
हमने भाई भाई को लड़ाया है…

हम देश को निचोड़ के बेच देंगे…
तुम इत्मीनान रखना…
बस पैसा कम न हो जाये…
मेरे स्विस खाते का ख्याल रखना…

इसी बीच मीडिया वाला चिल्लाया…
तोड़ दारू की बोतल…
जोर से बड़बड़ाया…
तुम दोनों कुछ भी न होते…
हम अगर तुम्हारे साथ न होते…
तुम्हारी हर नीच हरकत हम छुपाते हैं…
पकड़ के किसी भी बेक़सूर को…
ज़ालिम ज़ालिम चिल्लाते हैं…
ब्रांडेड आपके इसलिए बिकते हैं….
क्योंकि हर ब्रेक में हमारे दिखाए ही दीखते हैं…
विदेशी सामान का असली सच…
हम दिखते नहीं हैं…
लाइफबॉय को कुत्तों का साबुन बताते नहीं हैं….
इसलिए अच्छे स्वदेशी प्रोडक्ट…
टिक पते नहीं हैं…
अच्छे भले संतों को हम फंसा रहे हैं…
इसलिए आपके धरम के लोगों को…
अधर्मी-विधर्मी बना रहे हैं…
हर चैनल, हर एंकर, बिकता है…
इसलिए सुबह-सुबह ६ बजे से….
जो चाहो दीखता है…
अगर सिर्फ २४ घंटे…
हम ईमानदारी से खबरें चला दें…
तुम दोनों को एक ही दिन में….
तिहाड़ जेल भिजवा दें…
मगर क्या करें…
हम-तुम-सब तो इकठ्ठे हैं…
एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं…
‘डिवाइड एंड रूल’ हमारा पेशा है…
लोग मरें तो मरें…
हमें दुःख कैसा है?

जागो !

स्वराज के लिए जागो !

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